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हनुमान जी और बाली के युद्ध की अनसुनी कथा: जब बाली के शरीर में समाने लगी बजरंगबली की शक्ति

HANUMAN
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क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी और बाली के युद्ध में क्या हुआ था? जब बाली, बजरंगबली की आधी शक्ति को भी नहीं संभाल पाया और उसका शरीर फटने लगा। जानिए ब्रह्मा जी के वरदान और हनुमान जी के अनंत बल की यह अद्भुत पौराणिक कथा।

हिंदू धर्म ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में महाबली बाली और भक्त शिरोमणि हनुमान जी के बीच के एक ऐसे प्रसंग का वर्णन मिलता है, जो हमें सिखाता है कि भक्ति के सामने अहंकार कभी नहीं टिक सकता। क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा आया था जब बाली, हनुमान जी की शक्ति के केवल छोटे से अंश को भी नहीं संभाल पाया था?

आइए जानते हैं हनुमान जी और बाली के युद्ध (Hanuman vs Bali Yudh Story) की वह रोमांचक कहानी, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।


बाली को प्राप्त था ब्रह्मा जी का अजेय वरदान

रामायण काल में किष्किंधा के राजा बाली को ब्रह्मा जी से एक विशेष वरदान प्राप्त था। वरदान यह था कि जो कोई भी बाली के सामने युद्ध करने आएगा, उसकी आधी शक्ति (Half Strength) बाली के शरीर में समा जाएगी। इसी वरदान के कारण बाली अजेय था। उसने रावण जैसे महायोद्धा को भी परास्त कर अपनी पूँछ में 6 महीने तक बांधे रखा था।

जब अहंकार ने घेरा बाली को

​अपनी अपार शक्ति के मद में चूर होकर बाली वन के शांत वातावरण को तहस-नहस करने लगा। वह पेड़ों को उखाड़ता और गर्जना करता कि "क्या कोई ऐसा योद्धा है जो बाली को युद्ध में हरा सके?"

​उसी वन में पवनपुत्र हनुमान जी एकाग्र चित्त होकर भगवान श्री राम के नाम का जाप कर रहे थे। बाली के शोर से उनकी तपस्या में विघ्न पड़ा। हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता से बाली को समझाया, "हे राजकुमार! इस शांत तपोवन को नष्ट न करें और प्रभु श्री राम का नाम जपें, इसी में कल्याण है।"

बाली की चुनौती और हनुमान जी का क्रोध

​अहंकार में डूबे बाली ने हनुमान जी का उपहास उड़ाया और यहाँ तक कि भगवान श्री राम को भी अपशब्द कहे। अपने आराध्य का अपमान हनुमान जी सहन न कर सके। उन्होंने बाली की चुनौती स्वीकार कर ली और अगले दिन नगर के बीचों-बीच युद्ध का समय तय हुआ।

ब्रह्मा जी का हनुमान जी को सुझाव

​युद्ध से पूर्व स्वयं ब्रह्मा जी हनुमान जी के सम्मुख प्रकट हुए। ब्रह्मा जी जानते थे कि यदि हनुमान जी अपनी पूरी शक्ति लेकर बाली के सामने गए, तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा। उन्होंने हनुमान जी से निवेदन किया, "हे अंजनीसुत! आप अपने बल का केवल 10वां भाग (10th part of strength) ही लेकर युद्ध में जाएं, शेष बल प्रभु चरणों में समर्पित कर दें।"

​हनुमान जी ने पितामह की आज्ञा का पालन किया।

युद्ध भूमि का वो मंजर: जब बाली का शरीर फटने लगा

​अगले दिन जैसे ही हनुमान जी ने अखाड़े में कदम रखा, वरदान के अनुसार उनकी आधी शक्ति बाली के शरीर में स्थानांतरित होने लगी। लेकिन यह क्या? जैसे-जैसे शक्ति बाली के भीतर जा रही थी, बाली का शरीर फूलने लगा। उसकी नसों में रक्त का दबाव इतना बढ़ गया कि उसे लगा उसका शरीर अभी विस्फोट हो जाएगा।

​तभी ब्रह्मा जी पुनः प्रकट हुए और चिल्लाए— "बाली! अगर जीवित रहना चाहते हो तो अभी इसी वक्त यहाँ से कोसों दूर भाग जाओ, वरना तुम्हारा अंत निश्चित है!"

​बाली जान बचाकर भागा और 100 मील दूर जाकर गिरा।

सत्य का बोध और बाली का पश्चाताप

​जब बाली को होश आया, तो ब्रह्मा जी ने उसे समझाया:

"पुत्र! तुम हनुमान जी के 10वें हिस्से की आधी शक्ति भी नहीं झेल पाए। सोचो, यदि वे अपनी पूरी शक्ति के साथ आते, तो तुम उसी क्षण भस्म हो जाते। उनकी शक्ति को पूरी सृष्टि भी नहीं संभाल सकती।"

​बाली को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने हनुमान जी से क्षमा मांगी और समझ गया कि असली बल अहंकार में नहीं, बल्कि प्रभु की भक्ति और विनम्रता में है।

निष्कर्ष (Conclusion)

​यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे हमारे पास कितनी ही शक्ति क्यों न हो, कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। हनुमान जी का बल अथाह है, फिर भी वे सदैव 'राम दूत' बनकर विनम्र रहते हैं।

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